अध्याय 3: कर्मयोग

भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 21

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संस्कृत श्लोक

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

हिंदी अर्थ

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु 'लोक' शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)

सरल हिंदी व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में कर्मयोग के सिद्धांत को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि समाज में श्रेष्ठ व्यक्ति का आचरण और व्यवहार सामान्य जनों के लिए एक आदर्श होता है। जब कोई महान और प्रतिष्ठित व्यक्ति किसी कर्म या आचरण को अपनाता है, तो समाज के लोग स्वाभाविक रूप से उसी मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार, एक कुशल और आदर्श व्यक्तित्व समाज को सही दिशा दिखाता है और उसके आचरण को देखकर लोग उसे अपनाते हैं।

इस श्लोक से यह भी सीखने को मिलता है कि हमें अपने आचरण और कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि हमारे कार्य समाज पर प्रभाव डालते हैं। यदि हम ईमानदारी, धैर्य और समर्पण के साथ कर्म करें, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।

कर्मयोग का यह सिद्धांत हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने कर्मों के माध्यम से एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करें और समाज के लिए एक प्रेरणास्त्रोत बनें।