अध्याय 8: जन्म का वर्णन
पापी आत्माओं का दुखदाई जन्म ~ भगवान् विष्णु बताते हैं , किस तरह , स्त्री ,पुर्ष के मिलन से ,मनुष का जनम होता है।
पर्साब क 3 दिन के अंदर , पाप आत्मा का शरीर बनना शरू हो जाता है।
एक रात में मास का टुकड़ा , 5 रात में गोल , दसवें दिन वृक्ष के फल जैसा ।
एक महीने में - सिर ~ दुसरे महीने में - हाथ और दुसरे हिस्से , ~ तीसरे महीने में - बाल, नाख़ून, हड्डी ,लिंग ~ चोथे महीने - तल पदार्थ ~ पांच महीने - भूख , प्यास ~ छ: महीने - बच्चा दानी के बाई ओर चला जाता है।
जिस्म के बाकी हिस्सों का बनना , माता के खान पान पर निर्भर है।
अपनी पीठ और शरीर के बीच में सिर दबा होने से ,यह अपने हाथ , पैर , हिला नहीं सकता।
इस समय, आलोकिक शक्ति से , पिछले जन्मों में किये हुए कर्म याद आते हैं ।
7 वें महीने के आरम्भ से उसे चेतना आनि शुरू होती है और वह गर्भ शाळा में हिलना शुरू करता है। इश्वर से बिनती करता है , यदि मुझे यहाँ से बाहिर निकालो गे तो में सदा आप के चरणों में पड़ा रहूँगा । लेकिन यदि मेरे पाप कर्मों से मुझे सदा दुःख भोगने पड़ें गे , तो मैं कभी बाहिर नहीं आना चाहता।
गर्भाषा में 10 महीने से पड़े हुए , उस की पीडाओं को देखते हुए, कृपालू भगवान् , उस को बाहिर निकाल कर , उस का जन्म करवाते हैं । सिर नीचे,ज़बरदस्ती बाहर निकाला हुआ ,पीडत ,अपनी समस्त यादों को खो कर, नये वातावरण को देख कर , शिशु के रूप में, घबरा कर रोता है।
बचपन के दुखों को झेलता हुआ , जवानी में अपनी इन्द्रीओं के वश,बुरी आदतों में फंसा , दुर्लभता से मिले मनुष्य जीवन को , युहीं बर्बाद करके, वृद्ध अवस्था में बीमारीओं से घिरा ,मृतु के पश्चात् फिर नरक लोक में जाता है । इस तरह बुरे कर्मों के जाल में फंसा , मेरी प्रकृति से , पापी कभी मुक्त नहीं होता.।
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