अध्याय 6: पाठ भाग 3

पिंड दान में दी हुई "लाइ " से :-

प्रथम दिन - सर दुसरे दिन - गर्दन , कंधे तीसरे दिन - हृदय चौथे दिन - पीठ पांचवें दिन - धूनी छेवें दिन - कुल्हे, गुप्त अंग सातवें दिन - जांघ आठवें दिन - घुटने नवें दिन - पेर दसवें दिन - भूख , प्यास

यह निर्वाचित प्रेत-शरीर, भूख , प्यास से दुखी , 11 वें , 12 वें दिन भोजन करता है ।

तेहरवें दिन , प्रेत शरीर ,यमदूतों के पाश्बुधों में जकड़ा ,एक बंदी बन्दर की तरह ,मृतु सडक पर घसीड़ता हुआ ,चलता है.।

यम नगरी की दूरी 86000 योजन ( 1 योजन =15 की .मी लग -भग ) है। और एक दिन-रात में 247 योजन चलना पड़ता है.। 16 पौर रास्ते में ,अनेक प्रकार की यातनाएं , दुर्लभ रास्ते, भयानक पीडाएं , 11 महीनों तक सहते हुए ,यम राज का राज्य शुरू होता है । वहां से यम नगरी का रास्ता शुरू होता है, जो की इस से भी कष्ट दाई है।

टिप्पणी: कई विद्वानों का मत है की यह प्रेत -आत्मा वायु की सहायता से चलती है और हम यह समझ सकते हैं की जो वायु प्रेत -आत्मा को ले कर चलती है, उसे कई प्रकार के वातावरण , जैसे बदबू, नदी, पहाड़, ठंड ,गर्मी, जानवर आदि के पास से निकलना पड़ता है । गरुड़ पुराण में वेतेरनी नदी का इतना भयानक रूप वर्णन किया है । सम्भवता प्राचीन काल में लिखा गया यह ग्रन्थ ,उस समय में ब्राह्मों और गौ की शुरक्षा के हेतु , आम जनता के दिलों में एक आलोकिक भय बिठाने के लिए ,वर्णित किया गया है। ताकि लोगों में ब्राह्मिनो को गौ , अन्य दान देने से उन के पाप नष्ट होने का भ्रम बना रहे ।

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