अध्याय 3: पाठ भाग 3

दोबारा घर में स्नानं करने के बाद , पुत्र को पहिले गौ को खाना देकर, पत्ते की प्लेट पर स्वय खाना ,खाना चाहिए , किन्तु खाना पहले से ही बना नहीं होना चाहिए ।

मृतु वाली स्थान को गोबर से साफ़ करके, एक दीपक ( जिस का मुख दक्षिण की तरफ रहे ,) १२ दिन तक उस स्थान पर जलता रहना चाहिए ।

अग्नि दाह "पंचक " में नहीं करना चाहिए । जो प्राणी "पंचक" में प्राण त्यागता है , उस की मुक्ति नहीं होती

दाह - संस्कार भी नहीं करना चाहिए वरना घर में एक और मृतु हो सकती है ।

मास के प्रारम्भ में " धनिष्ठा" नक्षत्र के अर्ध भाग से लेकर " रेवती नक्षत्र " तक का समय पंचकल कहलाता है । पंचक में दाह संस्कार करना हो तो कुश के मानवकार चार पुतले बना कर नक्षत्र मन्त्रों से उनको अभिम्न्त्तिरित करके शव पर रख दें और उन्ही पुतलों के साथ दाह -संस्कार करें.। पुत्रों दुअरा पंचक शांति भी करवानी चाहिए ।

तीन दिन तक , चौराहे पर , या चिता वाली ज़मीन पर , एक मिटटी के कच्चे बर्तन में ,जो की तीन लकड़ी की डंडियों से बंधा हो ,दूध और पानी से भरा हुआ ,अर्पण करे ।

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