अध्याय 2: पाठ भाग 7

तिल मेरे पसीने से उत्पन्न हुए हैं ।इस का प्रयोग करने पर असुर , दानव ,दैत्ये भाग जाते हैं। एक ही तिल का दाना स्वर्ण के बत्तीस सेर तिल के बराबर हैं ।

कुश मेरे शरीर के रोमों से उत्पन्न हुए हैं । कुश के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, तथा अग्र भाग में शिव को जानना चाहिए । इस लिए देवताओं की त्रप्ति के लिए मुख रूप से "कुश" को , और पितरों की तृप्ति के लिए "तिल " का महत्व है.। .

हे पक्षी श्रेष्ट , विष्णु, एकादशी व्रत , गीता , तुलसी, ब्राह्मिन और गौ ,यह छे , दुर्गम असार- संसार में लोगों को मुक्ति प्रदान करने के साधन हैं. । अंतिम साँसों में "ओ गंगा, ओ गंगा , भागवत गीता के शलोक अथवा "हरी" का नाम जपने से मंगल कारी होता है।.

मृतु काल में मरणासन्न के दोनो हाथों में "कुश" रखना चाहिए / इस से प्राणी विष्णु लोक को प्राप्त होता है।

लावनारस, पितरों को प्रिय होता है अथवा स्वर्ग प्रदान करता है।

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