अध्याय 2: पाठ भाग 2

यमदुआर पर पहुँचने के जो मार्ग बताये गए हैं , वह अत्यंत दुर्ग्न्धिक , मवाद ,रक्त्त आदि से परिव्याप्त हैं । अत: उस मार्ग में स्थित वैतरणी नदी को पार करने के लिए वैतरणी- गौ (जो गौ सर्वांग में काली हो और जिस के थन भी काले हों ) का दान करने चाहिए । यह सब उत्तम प्रकृति वाले ब्राह्मण को देना चाहिए ।

पद दान का महत्व :- छत्र, जूता, वस्त्र ,अंगूठी ,कमंडलू ,आसन, पात्र और भोजन पदार्थ , यह आठ प्राकर के पद दान हैं.। तिल पात्र, घृत पात्र, शय्या , तथा और जो अपने को ईष्ट हो, देना चाहिए।

हे पक्षी राज , इस पृथ्वी पर जिस ने पाप का प्रायश्चित कर लिया है ,सब प्रकार के दान भी दे चूका है, वैतरणी -गौ तथा अष्ट दान कर चूका है , जो तिल से पूर्ण पात्र , घी से भरा पात्र ,शय्या दान और विधिवत पद दान करता है, वह नर्क रुपी गर्भ में नहीं आता ,अर्थात उस का पुनर्जन्म नहीं होता ।

मनुष स्वय जो दान करता है , परलोक में वह सब उसे प्राप्त होता है । वहां उस के आगे रखा हुआ मिलता है ।

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