अध्याय 2: पाठ भाग 1
मरणासन्न व्यक्ति के लिए कल्याणकारी कर्म
सब से पहले भूमि को गोबर से तोपना चाहिए । फिर जल की रेखा से मंडल बना कर , उस पर तिल और कुश घास बिछा कर मरणासन्न व्यक्ति को उस पर सुला देना चाहिए । उस के मूंह में पंचरत्न / स्वर्ण आदि डालने से सब पापों को जला कर मुक्त कर देता है । भूत , प्रेत आत्माएं और यम के दूत अपवित्र स्थान और ज़मीन के ऊपर रखी चारपाई से मृत शरीर में प्रवेश करते हैं।
उस के मूंह में गंगा जल डालना चाहिए , अथवा तुलसी का पत्ता रखना चाहिए।
कोई भी शोक न मनाता हुआ ,उस के पास प्रभु का नाम ले।
जब तक प्राण हैं , विष्णु का नाम ले।
यमराज का अपने दूतों को आदेश है कि मेरे पास उन आत्माओं को लाओ जो "हरी" का नाम नहीं लेते। "ॐ", " हरी" को जपने वाले मेरे पास नहीं आते । पापी मनुष जो नारायाण को नहीं मानते , उन के कितने ही पुन्य कर्म उन के पापों को नहीं मिटा सकते ।
हे गरुड़ , जाने या अनजाने में मनुष , जो भी पाप करते हैं , उन पापों की शुद्धि के लिए उन्हें प्रायश्चित करना चाहिए / शाश्त्रों में दशविधि स्नान , च्न्द्राय्न्ना व्रत , गौ दान , आदि का लेख किया गया है । यदि मनुष उन में क्षमता के कारण सफल न हो रहा हो तो कम से कम चौथाइ प्राय्क्चित अवश्य करना चाहिए । तत्पश्चात 10 महादान ,गौ, भूमि ,तिल, स्वर्ण घी, वस्त्र , गुड ,रजत , लवण , इन का दान करना चाहिए । यह पाप की शुद्धि के लिए ,पवित्रता में एक से एक बढ़ कर हैं.।
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