अध्याय 1: पाठ भाग 5

जब मनुष अपने पिछले जनम के अछे, बुरे कर्म के संचित परिणामों को भोगता हुआ , और इस जन्म में कर्म करता हुआ , मरणासन्न अवस्था को पहुंच जाता है , तो शरीर में कई रोग उत्पन होते हैं । एक अचानक सर्प की भांति ,वह मौत के जकडन में बंधता चला जाता है ।वह घर में ,अस्यहीन , अपाहज ,शारीरक मानसिक , पीडाओं से पीडत ,फिर भी जीने की मन में इच्छा को ले कर ,दुखदाई जीवन व्यतीत करता है ।

जब मरनासन्न व्यक्ति की इन्द्रयों का समूह व्याकुल हो जाता है ,चेतन शरीर जड़ीभूत हो जाता है , तब अंतिम क्षणों में एक आलोकिक चेतना आती है ,जिस में सभी लोक एक जैसे दीखते हैं । उस समय वह कुछ बोलने योग्य नहीं रहता और प्राण शरीर को छोड़ कर यमराज के दूतों के साथ चल देते हैं ।

जब प्राण शरीर को छोड़ते हैं तो बहुत कष्ट दाई होते हैं और ऐसा दर्द होता है जैसे एक सो बिछुओं ने डंक मारा हो / उस के मुंह में झाग बनती है और सारा मुंह थूक से भरने लगता है ।

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