समुद्र-लंघन और मार्ग की परीक्षाएँ
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प्रसंग का सरल हिंदी सार और भाव
हनुमान राम का कार्य पूरा करने के लिए समुद्र पार करते हैं। मैनाक विश्राम का निमंत्रण देता है, सुरसा उनकी परीक्षा लेती है और सिंहिका उनकी छाया पकड़ती है। हर बाधा का समाधान एक जैसा नहीं है: कहीं सम्मानपूर्वक आगे बढ़ना, कहीं बुद्धि से रास्ता निकालना और कहीं संघर्ष करना पड़ता है।
समझने की बात: हनुमान की सफलता में बल के साथ परिस्थिति पहचानने और लक्ष्य पर टिके रहने की क्षमता दिखाई देती है।
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥1॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार-बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥3॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥5॥
दोहा 1
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥1॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥2॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥ कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥3॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥4॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥5॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥6॥
दोहा 2
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥2॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥ जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥1॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ सोइ छल हनूमान् कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥2॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥ तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥3॥
पाठ और अर्थ के बारे में
मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है; मुख्य पाठ अवधी में और आरंभिक श्लोक संस्कृत में हैं। यहाँ Banaka के सुंदरकांड ऐप का पारंपरिक पाठ दिया गया है। 19 प्रसंग पढ़ने की सुविधा के लिए बनाए गए हैं; ये रामचरितमानस के अलग अध्याय नहीं हैं। प्रसंगवार सार और शब्दार्थ Banaka की नई व्याख्याएँ हैं, प्रत्येक चौपाई का शब्दशः अनुवाद नहीं।
पाठ दोहा 60 तक है। अलग पारायण परंपराओं में जुड़े आवाहन, न्यास और आरतियाँ इस मुख्य पाठ में शामिल नहीं हैं। पाठ की किसी त्रुटि की सूचना support@banaka.in पर दें।