हनुमान का रावण को संदेश

दोहा / सोरठा संख्या से चुनें
प्रसंग का सरल हिंदी सार और भाव

हनुमान राम के दूत के रूप में रावण से बात करते हैं। वे सीता को लौटाने और राम की शरण में आने का मार्ग बताते हैं। रावण संदेश को सुनकर भी अपने अहंकार से पीछे नहीं हटता। विभीषण दूत को मारने के विरुद्ध सलाह देते हैं; अंत में हनुमान की पूँछ में आग लगाने का आदेश होता है।

समझने की बात: सलाह सुनना और उसे स्वीकार करना अलग बातें हैं। रावण के सामने लौटने का रास्ता है, पर उसका अभिमान बाधा बनता है।

दोहा 20

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिसाद॥20॥

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥ की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥1॥

मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥ सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥2॥

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥ जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥3॥

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥ हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥4॥

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥5॥

दोहा 21

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥21॥

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥ समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥1॥

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥ सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥2॥

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥ मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥3॥

बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥ देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥4॥

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥ तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥5॥

दोहा 22

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥22॥

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥ रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥1॥

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥ बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥2॥

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥3॥

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥ संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥4॥

दोहा 23

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥23॥

जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥ बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥1॥

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥ उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥2॥

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥ सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥3॥

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥ आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥4॥

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥5॥

पाठ के आरंभ पर लौटें ↑

पाठ और अर्थ के बारे में

मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है; मुख्य पाठ अवधी में और आरंभिक श्लोक संस्कृत में हैं। यहाँ Banaka के सुंदरकांड ऐप का पारंपरिक पाठ दिया गया है। 19 प्रसंग पढ़ने की सुविधा के लिए बनाए गए हैं; ये रामचरितमानस के अलग अध्याय नहीं हैं। प्रसंगवार सार और शब्दार्थ Banaka की नई व्याख्याएँ हैं, प्रत्येक चौपाई का शब्दशः अनुवाद नहीं।

पाठ दोहा 60 तक है। अलग पारायण परंपराओं में जुड़े आवाहन, न्यास और आरतियाँ इस मुख्य पाठ में शामिल नहीं हैं। पाठ की किसी त्रुटि की सूचना support@banaka.in पर दें।