अध्याय 15: पाठ भाग 2

यह संसार दुखों की पिटारी है। जब तक मनुष्य मोह, माया के चक्कर में बंधा रहता है, सदा दुखी ही रहेगा। खाना,पीना, सोना, वासनाओं की तृप्ति ,से सभी प्राणी लिप्त हैं , केवल मनुष्य के पास ही विवेक है। जो विवेक से काम नहीं करता, वह जानवर है।

इस लिए जब तक मनुष्य का आपस में मोह है, मुक्ति नहीं है। मोह करना ही है तो भगवान् से मोह करो , जो आपके सब कष्टों को हरने वाला है। भगवान् से मोह करने के लिए, मन और आँखों की शुद्धता आवश्यक है। काम, क्रोद्ध ,लोभ ,अहंकार , यह मनुषय के पतन के पात्र हैं । वेद , शास्त्र के पठन से मुक्ति नहीं मिलती , जब तक उनका ज्ञान अपने अज्ञान को मिटने में सक्षम नहीं होता ।

"मेरा" और "मेरा नहीं ", यह दो पद हैं। "मेरा" में बंधन है और " मेरा नहीं" में मुक्ति है। इस लिए जो मुक्ति के इच्छुक हैं वह सब बन्धनों को तोड़ कर सत्य के साथ नाता जोड़ें । सत्य ही प्रेम है, प्रेम ही इश्वर है।

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