अध्याय 14: पाठ भाग 2
गरुड़ भगवान् जी से जिज्ञासा करते हैं ,कि बहुत से पापों को करने पर भी , इस संसार को पार कर,प्राणी आप को कैसे प्राप्त कर सकता है?
हे पक्षी राज! मनुष्य अपने- अपने कर्म में रह कर संसिद्ध प्राप्त कर लेता है। सत्य कर्म , शब्दादि विषयों का त्याग कर,राग-द्वेष , को छोड़ कर , यथाप्राप्त भोजन से संतुष्ट , मन ,वाणी , शरीर संयमित , काम,क्रोद्ध , लोभ, अहंकार और परिग्रह का परित्याग करके निर्भय हो कर , शांत हो जाता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ।
शरीर में आठ छिद्र हैं। सत्य कर्म करने वाली पुण्य आत्माओं के प्राण , उनके शरीर के ऊध्र्व छिद्रों से निकल कर परलोक जाते हैं ।
शब्द, स्पर्श,रूप,रस और गंध , यह पांच विषयों के अधीन , रहने वाले पुरुष , सदा ही दुखी रहते हैं। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और बन्धु , शमशान में ही छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेता है,। पपप-पुण्य ही उस जीव आत्मा के साथ जाते हैं। मनुष अपनी योनी में जो भी दान- पुण्य करता है वह सभी, जिस जिस योनी में व्यक्ति जाता है, वहा यह दान भी उपस्थित रहते हैं।
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