समुद्र की विनती और समापन
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प्रसंग का सरल हिंदी सार और भाव
तीन दिन की विनती के बाद भी समुद्र मार्ग नहीं देता, तो राम कठोर कदम उठाने को तैयार होते हैं। समुद्र उपस्थित होकर अपनी स्थिति बताता है और नल-नील की सहायता से सेतु बनाने का उपाय देता है। सुंदरकांड का अंत राम के गुणों को आदर से सुनने के भक्तिपूर्ण महत्व के साथ होता है।
समझने की बात: समापन में विनय, मर्यादा और व्यावहारिक उपाय साथ आते हैं। कथा सेतु-निर्माण की दिशा दिखाकर अगले कांड की भूमिका बनाती है।
दोहा 57
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥ सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥1॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥ क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥2॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥ संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥3॥
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥ कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥4॥
दोहा 58
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥58॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥। गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥ प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥2॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥ ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥ प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥4॥
दोहा 59
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥59॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥ तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥1॥
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥ एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥2॥
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥3॥
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥ सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥4॥
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
दोहा 60
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पंचमः सोपानः समाप्तः।
पाठ और अर्थ के बारे में
मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है; मुख्य पाठ अवधी में और आरंभिक श्लोक संस्कृत में हैं। यहाँ Banaka के सुंदरकांड ऐप का पारंपरिक पाठ दिया गया है। 19 प्रसंग पढ़ने की सुविधा के लिए बनाए गए हैं; ये रामचरितमानस के अलग अध्याय नहीं हैं। प्रसंगवार सार और शब्दार्थ Banaka की नई व्याख्याएँ हैं, प्रत्येक चौपाई का शब्दशः अनुवाद नहीं।
पाठ दोहा 60 तक है। अलग पारायण परंपराओं में जुड़े आवाहन, न्यास और आरतियाँ इस मुख्य पाठ में शामिल नहीं हैं। पाठ की किसी त्रुटि की सूचना support@banaka.in पर दें।